खेत बचाओ अभियान से 50 लाख किसानों तक पहुंचेगी सरकार: मिट्टी की सेहत सुधारने और संतुलित खाद के उपयोग पर जोर
रबी 2026 सीजन में देश के 34 राज्यों और 700 जिलों के 50,000 गांवों में चलेगा सघन जागरूकता अभियान, सॉइल टेस्ट के आधार पर ही उर्वरक डालने की सलाह
पचास लाख किसान, सात सौ से अधिक जिले और पचास हजार गांव—रबी 2026 के इस बुवाई सीजन में भारत सरकार ने देश की उपजाऊ मिट्टी को रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से बचाने के लिए अब तक का सबसे बड़ा राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा पत्र सूचना कार्यालय (PIB) के माध्यम से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक देश भर में ‘खेत बचाओ अभियान’ का सघन संचालन किया जा रहा है। इस राष्ट्रव्यापी पहल का मुख्य उद्देश्य अन्नदाताओं को मिट्टी की घटती उर्वरता के प्रति सचेत करना और खेतों में रासायनिक खादों के संतुलित व वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देना है।
पिछले कुछ दशकों में यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण खेतों की प्राकृतिक जैविक संरचना बुरी तरह प्रभावित हुई है। जमीन की जल सोखने की क्षमता घट रही है और मित्र कीट समाप्त हो रहे हैं। इस संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर यह बीड़ा उठाया है, ताकि आने वाले समय में खेती को टिकाऊ बनाया जा सके और फसलों की लागत घटाकर किसानों की शुद्ध आय में इजाफा किया जा सके।
अभियान के मुख्य आंकड़े और कवरेज एक नजर में
- अभियान का नाम: खेत बचाओ अभियान (रबी 2026)
- संचालन अवधि: 22 अक्टूबर 2026 से 30 नवंबर 2026 तक
- लक्षित किसान संख्या: लगभग 50 लाख अन्नदाता
- कवरेज क्षेत्र: 34 राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश
- जिलों की संख्या: 700 से अधिक कृषि प्रधान जिले
- गांवों की संख्या: 50,000 ग्राम पंचायतें और राजस्व गांव
- नोडल विभाग: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
- मुख्य ध्येय: मिट्टी परीक्षण आधारित संतुलित पोषण और प्राकृतिक खादों का समन्वय
आखिर क्यों पड़ी ‘खेत बचाओ अभियान’ की जरूरत?
कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आ रही है कि खेतों में खाद की खपत तो हर साल बढ़ रही है, लेकिन उस अनुपात में पैदावार नहीं बढ़ रही। मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, जो वर्तमान में कई राज्यों में बिगड़कर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। किसान भाइयों में यह आम धारणा बन गई है कि जितना अधिक यूरिया या डीएपी डालेंगे, फसल उतनी ही अच्छी होगी।

सच्चाई इसके ठीक उलट है। अधिक रासायनिक खाद डालने से फसल की शुरुआती बढ़वार भले ही तेजी से दिखे, लेकिन पौधों के तने कमजोर हो जाते हैं। फसल हल्की हवा में भी गिर जाती है और उन पर कीट-पतंगों व फफूंद जनित रोगों का हमला बढ़ जाता है। इसके अलावा, जमीन की ऊपरी परत सख्त हो जाती है, जिससे बीजों के अंकुरण में परेशानी आती है। ‘खेत बचाओ अभियान’ इसी सोच को बदलने और जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है।
अभियान की मुख्य रणनीतियां और कार्ययोजना
इस 40 दिवसीय महा-अभियान के तहत 50,000 गांवों में कृषि वैज्ञानिक, प्रसार अधिकारी और कृषि सखियां सीधे चौपालों पर किसानों से संवाद कर रही हैं।
1. ग्राम स्तर पर मिट्टी नमूना एकत्रीकरण: अभियान के तहत खेतों से मिट्टी के नमूने लेने की सही वैज्ञानिक तकनीक का प्रदर्शन किया जा रहा है, ताकि किसान स्वयं अपने खेत की मिट्टी की जांच करा सकें।
2. सॉइल हेल्थ कार्ड का वितरण और व्याख्या: किसानों को उनके खेत का मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) उपलब्ध कराया जा रहा है और उन्हें यह समझाया जा रहा है कि कार्ड में लिखे आंकड़ों के आधार पर ही खाद की खुराक तय करें।
3. नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का प्रोत्साहन: पारंपरिक बोरियों वाली खाद के स्थान पर तरल नैनो उर्वरकों के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है, जिससे खाद की बर्बादी रुके और पर्यावरण सुरक्षित रहे।
4. जैविक और रासायनिक खादों का संतुलन: अभियान में यह स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि रसायनों को एकदम बंद करने के बजाय, उनके साथ गोबर की सड़ी खाद, वर्मीकंपोस्ट और जैव उर्वरकों (जैसे एजोटोबैक्टर और पीएसबी) का 20 से 25 प्रतिशत मिश्रण जरूर किया जाए।
किसानों पर प्रभाव: लागत में बचत और मिट्टी की लंबी उम्र
इस अभियान से जुड़ने वाले किसानों को सीधा आर्थिक लाभ होगा। जब किसान मिट्टी जांच रिपोर्ट के अनुसार खाद डालेगा, तो अनावश्यक खादों पर होने वाला 15 से 30 प्रतिशत खर्च तुरंत बच जाएगा। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी खेत में पहले से ही फास्फोरस की मात्रा पर्याप्त है, तो वहां डीएपी की अतिरिक्त बोरी डालने की आवश्यकता नहीं होगी।
इसके साथ ही, संतुलित पोषण मिलने से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी, जिससे कीटनाशक दवाओं पर होने वाला अतिरिक्त खर्च भी कम होगा। लंबे समय में मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहेगी, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए खेत उपजाऊ बने रहेंगे।
अब क्या करें किसान भाई: चरणबद्ध मार्गदर्शिका
- गांव की कृषि चौपाल में भाग लें: 30 नवंबर 2026 तक आपके गांव में आयोजित होने वाले ‘खेत बचाओ’ विशेष शिविर या किसान गोष्ठी में अनिवार्य रूप से उपस्थित हों।
- खेत की मिट्टी की जांच कराएं: रबी फसलों की बुवाई से पहले अपने खेत के 4-5 स्थानों से अंग्रेजी के ‘V’ आकार में 6 से 9 इंच गहरा गड्ढा खोदकर मिट्टी का मिश्रित नमूना लें और नजदीकी जांच प्रयोगशाला में जमा करें।
- सॉइल हेल्थ कार्ड बनवाएं: यदि आपके पास पुराना कार्ड नहीं है, तो कृषि विभाग के पोर्टल (soilhealth.dac.gov.in) पर पंजीकरण कराकर नया कार्ड बनवाएं।
- अनुशंसित मात्रा ही खरीदें: मृदा स्वास्थ्य कार्ड में जितनी मात्रा यूरिया, डीएपी या पोटाश की संस्तुत की गई है, केवल उतनी ही खाद खरीदें; दूसरों की देखा-देखी अधिक खाद का भंडारण न करें।
- जिंक और सल्फर का प्रयोग: गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों में केवल डीएपी के भरोसे न रहें। मिट्टी की मांग के अनुसार जिंक सल्फेट और बेंटोनाइट सल्फर का प्रयोग जरूर करें।
- जैव उर्वरक अपनाएं: बुवाई के समय बीजों को एजोस्पिरिलम या राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें, ताकि हवा की नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से पौधों को मिल सके।
सावधानी: बिना जांच खाद डालना है पैसे की बर्बादी
अक्सर देखा जाता है कि किसान पड़ोसी किसान की देखा-देखी खेत में यूरिया का छिड़काव कर देते हैं। कृषि विशेषज्ञों की कड़ी चेतावनी है कि बिना मिट्टी परीक्षण के अंधाधुंध खाद डालना सीधे-सीधे अपनी गाढ़ी कमाई को आग लगाने जैसा है। अधिक यूरिया से न केवल भूमिगत जल प्रदूषित होता है, बल्कि मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणु भी मर जाते हैं। हमेशा अधिकृत दुकानों से ही पॉस (PoS) मशीन के जरिए आधार प्रमाणित खाद खरीदें और पक्का बिल लें।