कश्मीर में एप्पल स्कैब रोग से सेब की आपूर्ति प्रभावित: फफूंद के हमले से घटी फलों की गुणवत्ता, उत्पादकों की आय पर भारी दबाव
कश्मीर की मंडियों में पहुंचने वाला 50 से 60 फीसदी सेब बी और सी ग्रेड का होने का अनुमान, ए-ग्रेड सेब की कमी से बगीचों से लेकर मंडियों तक छाई मायूसी
कश्मीर की वादियों से देश के कोने-कोने तक मिठास पहुंचाने वाला सेब इस साल एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया है, जिससे बगीचों से लेकर मंडियों तक मायूसी का माहौल है। घाटी में इस साल ‘एप्पल स्कैब’ (फफूंद जनित रोग) के व्यापक प्रकोप के कारण सेब की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे देश भर की मंडियों में सेब की आपूर्ति और उसके व्यापारिक गणित पर गहरा असर पड़ा है। कश्मीर फल उत्पादक एवं डीलर्स एसोसिएशन के अनुसार, इस सीजन में मंडियों में पहुंच रहे सेबों में से करीब 50 से 60 प्रतिशत सेब केवल बी (B) और सी (C) ग्रेड के हैं, जिनकी गुणवत्ता कम होने के कारण बाजार में खरीदार नहीं मिल रहे हैं और कीमतें काफी गिर गई हैं।

इस फफूंद जनित रोग के कारण सेब के ऊपर काले और खुरदरे धब्बे पड़ गए हैं, जिससे फल देखने में खराब और बेअसर हो गए हैं। हालांकि, बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले रोग-मुक्त ए-ग्रेड (Grade A) सेब की मांग और कीमतें अब भी मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी बहुत कम रह जाने के कारण औसत बागवानों और उत्पादकों की आमदनी पर भारी दबाव देखा जा रहा है।
स्कैब रोग का प्रभाव और मंडी के हालात
- फसल का नाम: सेब (Apple – कश्मीर का मुख्य बागवानी उत्पाद)
- मुख्य बीमारी: एप्पल स्कैब (Venturia inaequalis नामक फफूंद से होने वाला रोग)
- प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: कश्मीर घाटी के मुख्य सेब उत्पादक जिले (सोपोर, बारामूला, शोपियां, अनंतनाग)
- गुणवत्ता में गिरावट: लगभग 50% से 60% सेब ‘B’ और ‘C’ ग्रेड में तब्दील
- मुख्य चिंता: लागत उतनी ही रही, लेकिन कम ग्रेड के फल होने से बाजार में भाव बहुत कम मिल रहे हैं
- वर्तमान मांग: रोग-मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले ‘A’ ग्रेड सेब की मांग मजबूत, पर उपलब्धता बेहद कम
- आंकड़ों का आधार: कश्मीर फल उत्पादक एवं डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव का अनुमान (PTI)
आखिर क्या है एप्पल स्कैब और क्यों बिगड़ी स्थिति?
एप्पल स्कैब सेब के बागानों में लगने वाला एक बेहद आम लेकिन विनाशकारी फफूंद जनित रोग है। यह बीमारी ‘वेंटुरिया इनइक्वलिस’ (Venturia inaequalis) नामक फंगस के कारण फैलती है। जब वसंत और गर्मियों की शुरुआत में मौसम में नमी अधिक होती है और लगातार बारिश होती है, तो इस फफूंद के बीजाणु सक्रिय होकर सेब की पत्तियों और छोटे फलों पर हमला कर देते हैं। इस साल कश्मीर में कली आने (Budding) और फल बनने की शुरुआती अवस्था के दौरान मौसम लगातार नम और ठंडा रहा, जिसने इस बीमारी को फैलने का पूरा मौका दिया।
इस बीमारी के कारण सेब के छिलके पर काले, भूरे और खुरदरे धब्बे बन जाते हैं, जिन्हें ‘स्कैब’ या पपड़ी कहा जाता है। प्रभावित सेबों की त्वचा सख्त हो जाती है, फल का आकार टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है और कभी-कभी फल बीच से फट भी जाता है। हालांकि, यह बीमारी सेब के अंदरूनी हिस्से (गूदे) को नुकसान नहीं पहुंचाती और यह खाने योग्य रहता है, लेकिन दिखने में खराब होने के कारण व्यापारिक मंडियों में इसकी कीमत औंधे मुंह गिर जाती है।
ग्रेडिंग का गणित और बागवानों का नुकसान
सेब के व्यापार में ग्रेडिंग का बहुत बड़ा महत्व होता है। मंडियों में सेब को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: ए-ग्रेड (सर्वोत्तम, बड़ा और बिना किसी दाग का लाल सेब), बी-ग्रेड (मध्यम आकार और थोड़े दाग-धब्बे वाला सेब), और सी-ग्रेड (छोटा आकार, अत्यधिक धब्बेदार और रोग-प्रभावित फल)।
एसोसिएशन के महासचिव के अनुसार, इस साल अधिकांश बागानों में स्कैब के प्रकोप के चलते ए-ग्रेड का उत्पादन बहुत कम हो पाया है। मंडियों में पहुंचने वाले 50 से 60 प्रतिशत सेब बी और सी ग्रेड के ही हैं। इन निम्न श्रेणियों के सेबों की मांग न के बराबर है, जिससे बागवानों को अपनी लागत निकालना भी भारी पड़ रहा है। जहाँ ए-ग्रेड सेब के अच्छे दाम मिल रहे हैं, वहीं बी और सी ग्रेड के सेब कौड़ियों के भाव बिक रहे हैं, जिससे बागवानों की पूरी लागत और मेहनत बेकार जा रही है।
बागवानों पर आर्थिक असर: लागत समान, आमदनी कम
बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि सेब के उत्पादन की लागत (दवाएं, खाद, मजदूरी, पैकेजिंग, और ट्रांसपोर्ट) हर साल बढ़ती जा रही है। स्कैब रोग से बचाने के लिए बागवानों ने इस साल भी महंगे फफूंदनाशक (Fungicide) स्प्रे किए थे, जिससे उनकी लागत में कोई कमी नहीं आई। लेकिन रोग के अत्यधिक प्रकोप के कारण जब अंतिम उत्पाद मंडी पहुंचा, तो वह कम ग्रेड का निकला, जिससे उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ रहा है।
छोटे और सीमांत बागवान, जिन्होंने बैंकों से कर्ज (KCC) लिया था या स्थानीय व्यापारियों से अग्रिम राशि ली थी, उनके सामने अब इस कर्ज को चुकाने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। मंडियों में आढ़ती भी खराब सेबों को लेने में कतरा रहे हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है।
भविष्य के लिए क्या करें बागवान: वैज्ञानिक और व्यावहारिक सलाह
यदि आपके बगीचे में भी इस साल स्कैब का प्रकोप दिखा है, तो अगले सीजन में इस नुकसान से बचने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण कदम उठाने की सलाह दी जाती है:
पहली बात, बागानों की स्वच्छता सबसे जरूरी है। एप्पल स्कैब की फफूंद सर्दियों के दौरान जमीन पर गिरी हुई सूखी पत्तियों और खराब फलों में ही जिंदा रहती है। इसलिए पतझड़ के इस मौसम में बगीचे की सभी गिरी हुई पत्तियों, टहनियों और खराब फलों को इकट्ठा करके बगीचे से दूर गड्ढे में दबा दें या नष्ट कर दें।
दूसरी बात, यूरिया का छिड़काव करें। पत्तियों के तेजी से सड़ने और फफूंद के जीवन चक्र को तोड़ने के लिए पत्तियों के गिरने के समय (अक्टूबर-नवंबर) बागान में 5 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव करें। इससे पत्तियां जल्दी सड़कर खाद बन जाएंगी और अगले साल फफूंद के बीजाणु पैदा नहीं हो पाएंगे।
तीसरी बात, समय पर फफूंदनाशक का छिड़काव करें। अगले साल वसंत ऋतु में जैसे ही सेब के पेड़ों में हरी पत्तियां और कलियां (Green Tip Stage) आने लगें, बागवानी विभाग द्वारा अनुशंसित फफूंदनाशक (जैसे मैंकोजेब, कैप्टन या कार्बेन्डाजिम) का पहला छिड़काव अवश्य करें। मौसम की नमी के आधार पर वैज्ञानिकों के परामर्श से ही अगला छिड़काव तय करें।
चौथी बात, पेड़ों की छंटाई (Pruning) सही तरीके से करें। सर्दियों में पेड़ों की छंटाई इस प्रकार करें कि पेड़ के अंदर तक हवा और धूप आसानी से पहुंच सके। घने बगीचों में नमी ज्यादा समय तक रुकती है, जिससे फफूंद का हमला तेज होता है।
पांचवीं बात, जल निकासी का उचित प्रबंधन करें। बगीचे में कहीं भी पानी का जमाव न होने दें। पानी जमा होने से हवा में नमी बढ़ती है जो इस बीमारी को और तेजी से फैलने में मदद करती है।
बागवानी विभाग की भूमिका और मुआवजा की मांग
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए घाटी के विभिन्न किसान संगठनों ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन और बागवानी विभाग से विशेष हस्तक्षेप की मांग की है। बागवानों का कहना है कि उन्हें खराब और नकली दवाओं के कारण भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है, इसलिए विभाग को दवाओं की गुणवत्ता की कड़ाई से जांच करनी चाहिए। इसके साथ ही, प्राकृतिक आपदा और बीमारी से प्रभावित बेहद गरीब बागवानों के लिए विशेष राहत पैकेज या फसल बीमा (PMFBY) के तहत त्वरित दावों के निपटारे की मांग भी उठाई जा रही है।