कम पानी वाले क्षेत्रों में चना, सरसों और मसूर की बुवाई पर जोर: कृषि मंत्री के अहम निर्देश

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खरीफ कटाई के बाद खेत की बची नमी का सही उपयोग कर रबी फसलों की बुवाई तेज करने की दी गई सलाह।

कम पानी और सीमित सिंचाई सुविधा वाले इलाकों में इस रबी सीजन किसानों को चना, सरसों, मसूर और मोटे अनाज की खेती को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने जोर देकर कहा है कि खरीफ फसलों की कटाई के तुरंत बाद खेतों में बची प्राकृतिक नमी का अधिकतम उपयोग किया जाए, ताकि बिना अतिरिक्त सिंचाई के भी रबी बुवाई समय पर पूरी हो सके। इसके साथ ही मौसम के उतार-चढ़ाव से फसलों को बचाने के लिए किसानों तक जलवायु और गर्मी-सहिष्णु बीजों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया गया है।

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विषयमुख्य विवरण
अभियान का उद्देश्यकम पानी व सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में दलहन-तिलहन का रकबा बढ़ाना
प्राथमिकता वाली फसलेंचना, सरसों, मसूर और मोटे अनाज (Nutri-cereals)
बुवाई रणनीतिखरीफ की कटाई के बाद मिट्टी की अवशिष्ट नमी (Residual Moisture) का त्वरित उपयोग
बीज आपूर्ति प्राथमिकताबदलते तापमान और मौसम के अनुकूल जलवायु-सहिष्णु (Climate-Resilient) किस्में
सिंचाई प्रबंधनकम लागत और न्यूनतम पानी की आवश्यकता वाली फसल प्रणालियों को बढ़ावा
मूल सूचना स्रोतकृषि मंत्रालय समीक्षा बैठक (Business Standard / PTI रिपोर्ट अनुसार)

बची हुई नमी का तुरंत उपयोग क्यों जरूरी है

मानसून के बाद खरीफ फसलों की कटाई होते ही खेत की ऊपरी सतह में कुछ दिनों तक नमी मौजूद रहती है। यदि बुवाई में देरी की जाए, तो तेज धूप और हवा के कारण यह नमी तेजी से वाष्पीकृत हो जाती है। ऐसी स्थिति में किसान को बुवाई के लिए पलेवा (बुवाई पूर्व सिंचाई) करनी पड़ती है, जिससे न केवल भूमिगत जल और ईंधन की बर्बादी होती है, बल्कि लागत भी बढ़ जाती है।

कृषि विभाग की ताजा सलाह के अनुसार, यदि किसान कटाई के तुरंत बाद हल्की जुताई करके पाटा लगा दें और सीधे रबी बुवाई शुरू करें, तो बची हुई नमी में ही बीजों का शत-प्रतिशत अंकुरण संभव हो जाता है। यह तकनीक विशेषकर उन क्षेत्रों के लिए अत्यंत लाभकारी है जहां नहर या नलकूप की पर्याप्त सुविधा नहीं है।

चना, सरसों और मसूर: कम लागत में बेहतर मुनाफे का गणित

रबी फसलों में गेहूं की तुलना में दलहन और तिलहन फसलों को काफी कम पानी की आवश्यकता होती है। जहां पारंपरिक गेहूं को पकने तक 4 से 6 सिंचाइयों की दरकार होती है, वहीं सरसों और चने को पूरे फसल चक्र में केवल 1 से 2 हल्की सिंचाइयों से सफलतापूर्वक पकाया जा सकता है।

फसलपानी की जरूरत (औसत सिंचाई)अनुकूल मिट्टीप्रमुख विशेषताएं
सरसों1 से 2 सिंचाईबलुई दोमट से मटियारकम लागत, शुरुआती पाले से बचाव जरूरी, बाजार में स्थिर मांग
चना1 से 2 सिंचाई (फूल आने से पहले व दाना बनते समय)दोमट से भारी मिट्टीनाइट्रोजन स्थिरीकरण से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है
मसूर1 सिंचाई या केवल नमी पर आधारितहल्की से मध्यम दोमटअति-कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए सबसे मुफीद दलहन
मोटे अनाज (ज्वार/रागी आदि)न्यूनतम / वर्षा आधारितसामान्य से पथरीली जमीनसूखा-रोधी, न्यूनतम पोषण प्रबंधन में भी संतोषजनक उत्पादन

सरसों और दलहनी फसलों की लागत कम होने के कारण जोखिम भी कम रहता है। इसके अतिरिक्त, दलहन फसलें हवा से नाइट्रोजन सोखकर जमीन की सेहत सुधारती हैं, जिससे अगली फसल में रासायनिक खाद का खर्च भी घट जाता है।

बदलते मौसम और तापमान में सहिष्णु बीजों की भूमिका

हाल के वर्षों में रबी सीजन के दौरान तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। बुवाई के समय अधिक गर्मी और कटाई के समय अचानक बढ़ते तापमान (टर्मिनल हीट) से फसलों की उत्पादकता प्रभावित होती है।

इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि मंत्री ने निर्देश दिया है कि राज्यों और बीज वितरण एजेंसियों द्वारा किसानों को सामान्य बीजों के स्थान पर जलवायु-सहिष्णु (Climate-Resilient) और गर्मी-सहिष्णु (Heat-Tolerant) प्रमाणित बीज ही उपलब्ध कराए जाएं। ICAR द्वारा विकसित ऐसी किस्में न केवल कम पानी में जीवित रहती हैं, बल्कि दाना भरते समय अचानक तापमान बढ़ने पर भी उपज में बड़ी गिरावट नहीं आने देतीं।

किसानों पर प्रभाव: छोटे और बारानी किसानों को सीधा सहारा

इस नीतिगत पहल का सबसे बड़ा सकारात्मक असर उन किसानों पर पड़ेगा जो पूरी तरह वर्षा आधारित (Rainfed) या सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में खेती करते हैं।

  • लागत में कमी: कम सिंचाई और रासायनिक खादों की कम जरूरत के चलते प्रति एकड़ इनपुट लागत लगभग 25% से 35% तक कम हो सकती है।
  • बाजार में सुनिश्चित भाव: केंद्र सरकार द्वारा दलहन और तिलहन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में निरंतर की गई वृद्धि से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना मजबूत हुई है।
  • जोखिम प्रबंधन: यदि शीतकाल में मावठ (सर्दियों की बारिश) कम भी होती है, तब भी चना और मसूर जैसी फसलें भारी आर्थिक नुकसान से बचा लेती हैं।

रबी बुवाई के समय किसान क्या करें: चरणबद्ध प्रक्रिया

  1. मिट्टी की नमी की जांच: खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने पर ही बीज डालें; नमी कम हो तो उथली बुवाई करें।
  2. प्रमाणित बीज का चुनाव: सरकारी बीज केंद्रों, प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (PACS) या अधिकृत डीलरों से ही प्रमाणित व उपचारित बीज खरीदें।
  3. बीज उपचार (Seed Treatment): फफूंदनाशक और राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित जरूर करें ताकि शुरुआती उकठा (Wilt) रोग से बचाव हो सके।
  4. संतुलित उर्वरक प्रयोग: मिट्टी जांच रिपोर्ट (Soil Health Card) के अनुसार ही फास्फोरस और सल्फर की मात्रा दें; दलहन फसलों में यूरिया का अत्यधिक उपयोग न करें।
  5. पंक्ति से पंक्ति की दूरी: सरसों और चने में उचित दूरी बनाकर रखें ताकि पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिल सके, जिससे कीट प्रकोप कम रहता है।
  6. अग्रिम कृषि सलाह: मौसम की जानकारी और कीट चेतावनी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के संपर्क में रहें।
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About sapana

Studied MSc Agriculture from Banaras Hindu University and having more than 2 years of field experience in field of Agriculture.

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