कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) ने जिले के पांच प्रखंडों में शुरू किया विशेष अभियान; प्रति एकड़ ₹18,000 से ₹20,000 तक शुद्ध मुनाफे का अनुमान।
290 हेक्टेयर भूमि — यही वह विशाल लक्ष्य है जो इस साल रबी सीजन 2026-27 में झारखंड के गुमला जिले में सरसों की खेती के लिए तय किया गया है। जिले में तिलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाने और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के इरादे से कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), गुमला और विकास भारती बिशुनपुर द्वारा एक साझा प्रयास शुरू किया गया है। इस विशेष अभियान के तहत न केवल किसानों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज और जरूरी खाद भी उपलब्ध कराई जा रही है।
गुमला के पांच प्रमुख प्रखंडों — घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, रायडीह और बसिया के विभिन्न गांवों में इस योजना को युद्ध स्तर पर लागू किया जा रहा है। रबी सीजन में धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में सरसों लगाकर किसान कम लागत में अतिरिक्त आमदनी पा सकेंगे।

पांच प्रखंडों के गांवों में हुआ किसानों का प्रशिक्षण
सरसों की खेती को पूरी तरह वैज्ञानिक और लाभदायक बनाने के लिए KVK के वैज्ञानिकों द्वारा 7 अक्टूबर से लेकर 29 अक्टूबर तक जिले के चिन्हित प्रखंडों में सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविरों में किसानों को बुवाई की उन्नत तकनीक, सही समय पर खाद देने की विधि, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोगों से फसल को बचाने के गुर सिखाए गए।
इस अभियान का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिकों ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भरतपुर स्थित भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान की विशेष परियोजना के जरिए गुमला के किसानों को यह मदद पहुंचाई जा रही है। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसान परंपरागत और पुराने तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाएं ताकि पैदावार को अधिकतम किया जा सके।
डीआरएमआर-150-35 और बीबीएम-1 किस्मों की विशेषताएं
इस साल प्रदर्शन और बुवाई के लिए विशेष रूप से ‘DRMR-150-35’ और ‘BBM-1’ जैसी सरसों की अत्यंत उन्नत और अधिक तेल वाली किस्मों (प्रभेदों) का चुनाव किया गया है। इन दोनों ही किस्मों की अपनी वैज्ञानिक विशेषताएं हैं जो इन्हें गुमला की जलवायु के लिए मुफीद बनाती हैं।
‘DRMR-150-35’ और ‘BBM-1’ किस्मों में तेल की मात्रा क्रमशः 39.8 प्रतिशत और 40.03 प्रतिशत तक आंकी गई है। इसका सीधा फायदा यह है कि इस सरसों से अधिक तेल निकाला जा सकेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक सरसों की तुलना में इन किस्मों की मात्र 2.5 से 2.75 किलो सरसों से ही पूरा एक किलो शुद्ध सरसों का तेल प्राप्त किया जा सकता है, जो आम किस्मों से कहीं अधिक है। यह फसल लगभग 95 से 110 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है, जिससे किसानों का खेत अगली फसल के लिए भी समय पर खाली हो जाता है।
बीज के साथ खाद का भी पूरा इंतजाम
सरसों की बुवाई के समय ही पौधों को सही पोषण देना बेहद जरूरी होता है। गुमला के किसानों को बीज की आपूर्ति करने के साथ-साथ यूरिया, डीएपी (DAP), एमओपी (MOP) और सबसे महत्वपूर्ण ‘सल्फर’ खाद भी निःशुल्क या अनुदानित तौर पर उपलब्ध कराई गई है।
सरसों जैसी तिलहनी फसलों में सल्फर (गंधक) का बहुत बड़ा योगदान होता है। यह न केवल पौधों की बढ़वार में मदद करता है, बल्कि दानों में तेल की प्रतिशत मात्रा को भी काफी बढ़ा देता है। इसके वैज्ञानिक इस्तेमाल से फसल में रोगों से लड़ने की क्षमता भी पैदा होती है। केवीके द्वारा समय पर खाद उपलब्ध कराए जाने से किसानों को बाजार के चक्कर काटने या नकली उर्वरकों के जाल में फंसने से मुक्ति मिली है।
प्रति एकड़ ₹18,000 से ₹20,000 तक शुद्ध कमाई का अनुमान
कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, सरसों की वैज्ञानिक खेती किसानों के लिए बेहद कम खर्चीली और अधिक मुनाफा देने वाली साबित हो सकती है। गेहूं जैसी पारंपरिक रबी फसलों की तुलना में सरसों को काफी कम पानी की जरूरत होती है और इसमें बार-बार सिंचाई नहीं करनी पड़ती। इसके अलावा इसमें खाद और निराई-गुड़ाई में लगने वाली मजदूरी की लागत भी बेहद कम होती है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सरकार द्वारा घोषित ₹6,200 प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और इन उन्नत किस्मों की अच्छी उत्पादकता को देखते हुए किसानों को प्रति एकड़ ₹18,000 से ₹20,000 तक की शुद्ध आमदनी हो सकती है। यह पूरी तरह से शुद्ध बचत होगी, क्योंकि योजना के तहत मुख्य बीज और जरूरी खाद पहले ही मुहैया करा दिए गए हैं। हालांकि, यह अंतिम आय फसल की वास्तविक उपज और कटाई के बाद बाजार के भाव पर भी काफी हद तक निर्भर करेगी।
किसानों पर प्रभाव और दूरगामी लाभ
इस व्यापक अभियान से गुमला जिले के छोटे और सीमांत किसानों को कई मोर्चों पर सीधा लाभ मिलने वाला है:
- लागत में भारी कमी: केवीके द्वारा उन्नत बीज और पोषण खाद उपलब्ध कराए जाने से किसानों का शुरुआती पूंजी निवेश बहुत कम हो गया है।
- परती भूमि का सदुपयोग: धान कटाई के बाद जो खेत आमतौर पर खाली और बंजर पड़े रहते थे, उनमें पीली सरसों लहलहाएगी, जिससे भूमि की उत्पादकता बढ़ेगी।
- आजीविका में सुधार: प्रति एकड़ करीब ₹18,000 से ₹20,000 की शुद्ध अतिरिक्त आय से जनजातीय और ग्रामीण परिवारों को अपने घरेलू खर्चे और बच्चों की पढ़ाई के लिए संबल मिलेगा।
- आत्मनिर्भरता: घरेलू स्तर पर तेल की घानी चलाकर या स्थानीय स्तर पर बिक्री कर ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य तेल की कमी को दूर किया जा सकेगा।
वैज्ञानिक विधि से बुवाई के समय किसान क्या करें
- खेत की तैयारी: धान की कटाई के तुरंत बाद खेत की हल्की जुताई करें ताकि बची हुई नमी का सही उपयोग किया जा सके। जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं ताकि ढेले टूट जाएं और नमी सुरक्षित रहे।
- उचित बीज दर: एक एकड़ क्षेत्र के लिए लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बीज ही पर्याप्त होता है। ध्यान रहे कि बीज को बहुत गहराई में न बोएं, वरना अंकुरण प्रभावित हो सकता है।
- बुवाई का तरीका: सरसों की बुवाई हमेशा कतारों (लाइन) में ही करनी चाहिए। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधों से पौधों की दूरी करीब 10 से 12 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
- उर्वरक का संतुलित उपयोग: बुवाई के समय ही यूरिया, डीएपी, एमओपी और सल्फर की अनुशंसित मात्रा का आधा हिस्सा डालें[cite: 1.1.18, 1.1.19]। सल्फर को मिट्टी में अच्छी तरह मिलाना न भूलें।
- सिंचाई और देखरेख: बुवाई के 25 से 30 दिन बाद (शाखाएं निकलने की अवस्था में) यदि खेत सूखा दिखे, तो पहली हल्की सिंचाई करें। दूसरी सिंचाई फलियां बनते समय (50 से 60 दिन बाद) की जा सकती है।
- घनी फसलों को विरल करना: बुवाई के 15-20 दिन बाद यदि पौधे बहुत पास-पास दिखाई दें, तो कमजोर पौधों को उखाड़कर उनके बीच की दूरी बढ़ा दें (विरलीकरण)। इससे बचे हुए पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलेगी।