एक बार खेत में रोपाई कर किसान 5 से 6 वर्षों तक लगातार 6 से 8 बार पौष्टिक हरा चारा काट सकते हैं।
डेयरी उद्योग और पशुपालन में कुल खर्च का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा केवल पशु आहार और चारे पर खर्च होता है। देश में अक्सर गर्मियों और सूखे के दिनों में पौष्टिक हरे चारे की गंभीर किल्लत खड़ी हो जाती है। इस संकट से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने गन्ने की पद्धति पर बहुवर्षीय हाइब्रिड नेपियर घास की खेती करने की सलाह दी है। इस घास की खासियत यह है कि इसे बार-बार बोने की जरूरत नहीं होती। एक बार खेत में सही तरीके से रोपाई करने के बाद किसान 4 से 6 सालों तक लगातार हर 45 से 60 दिन में ताजा हरा चारा काट सकते हैं।

मुख्य तथ्य एक नज़र में
- फसल का नाम: हाइब्रिड नेपियर घास (बाजरा-नेपियर संकर)
- रोपाई का माध्यम: तने की कलमें (2-3 गांठ वाली) अथवा जड़ वाले कल्ले (Root Slips)
- पहली कटाई: रोपाई के 60 से 70 दिन बाद
- अगली कटाइयों का अंतराल: प्रत्येक 45 से 60 दिनों में
- साल भर में कटाई: 6 से 8 बार
- फसल की जीवन अवधि: 4 से 6 वर्ष
- उपयुक्त पशु: गाय, भैंस, बकरी और भेड़
- चारा उपज: 150 से 250 टन प्रति हेक्टेयर सालाना (उचित देखरेख में)
गन्ने की तरह क्यों और कैसे होती है इसकी बुवाई?
हाइब्रिड नेपियर सामान्य बाजरा और अफ्रीकी नेपियर घास का संकर रूप है। इसमें बीज नहीं बनते, इसलिए इसका प्रसार वानस्पतिक विधि (वेजिटेटिव प्रोपेगेशन) से होता है। ठीक वैसे ही जैसे गन्ने के टुकड़ों को खेत में लगाया जाता है, नेपियर के तनों की 2 से 3 गांठों वाली कलमों को खेत में तैयार मेड़ों या नालियों में दबाया जाता है।
रोपाई करते समय ध्यान रखें कि एक गांठ जमीन के अंदर अच्छी तरह दबी रहे और एक गांठ तिरछी अवस्था में बाहर रहे। यदि जड़ वाले कल्लों (रूट स्लिप्स) का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो जमाव और भी तेजी से होता है। खेत में कतार से कतार की दूरी 75 से 90 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 50 से 60 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
कम पानी में तेजी से बढ़वार और उच्च पोषण
नेपियर घास की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, जिसके कारण यह सूखे के प्रति काफी सहनशील होती है। गर्मियों के दिनों में जब अन्य चारा फसलें सूखने लगती हैं, तब भी यह खेत में हरी बनी रहती है। पोषक तत्वों की बात करें तो इसमें 9 से 12 प्रतिशत तक कच्चा प्रोटीन, प्रचुर मात्रा में रेशा और शर्करा पाई जाती है। इसका तना रसीला और पत्तियां चौड़ी होती हैं, जिसे मवेशी बड़े चाव से खाते हैं। प्रतिदिन संतुलित मात्रा में यह चारा खिलाने से पशुओं के दूध उत्पादन में वृद्धि होती है और बाजार से खरीदे जाने वाले महंगे दाने पर निर्भरता कम होती है।
खेत की तैयारी और खाद-पानी का प्रबंधन
नेपियर की खेती के लिए जलभराव वाली जमीन को छोड़कर लगभग सभी प्रकार की बलुई दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है।
- खेत की तैयारी: खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करें और अंतिम जुताई के समय प्रति एकड़ 6 से 8 टन सड़ी गोबर की खाद अच्छी तरह मिला दें।
- रासायनिक पोषण: रोपाई के समय फास्फोरस और पोटाश की संस्तुत मात्रा दें।
- कटाई उपरांत यूरिया: नेपियर घास बहुत तेजी से बायोमास बनाती है, इसलिए प्रत्येक कटाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई के साथ प्रति एकड़ 25-30 किलोग्राम यूरिया या नाइट्रोजन देना आवश्यक होता है, जिससे नए कल्ले तेजी से फूटें।
- सिंचाई: शुरुआती दिनों में खेत में नमी बनाए रखें। गर्मियों में 10 से 12 दिनों के अंतर पर और सर्दियों में 20 से 25 दिनों के अंतर पर सिंचाई पर्याप्त होती है।
कटाई का सही नियम: न ज्यादा नीचे, न ज्यादा ऊपर
नेपियर घास से लगातार कई वर्षों तक उपज लेने के लिए कटाई का सही तरीका जानना जरूरी है:
- पहली कटाई: पौध लगाने के ठीक 60 से 70 दिन बाद, जब फसल लगभग 4 से 5 फीट ऊंची हो जाए, तब पहली कटाई करें।
- जमीन से ऊंचाई: कटाई करते समय पौधे को बिल्कुल जमीन से सटाकर न काटें। जमीन की सतह से 10 से 15 सेंटीमीटर (करीब 4 से 6 इंच) ऊंचाई छोड़कर ही हसिया चलाएं। ऐसा करने से तने के निचले हिस्से की आंखें सुरक्षित रहती हैं और नए कल्ले तेजी से निकलते हैं।
- कटाई का चक्र: पहली कटाई के बाद हर 45 से 55 दिनों में नई कटाई तैयार हो जाती है। वर्ष भर में किसान आसानी से 6 से 8 कटाइयां ले सकते हैं।
पशुपालकों के लिए जरूरी सावधानियां
- फसल में फूल आने से पहले काटें: जब घास की ऊंचाई 4 से 5 फीट हो, तभी कटाई कर लें। अधिक पुरानी होने या फूल आने के बाद इसका तना सख्त और रेशेदार हो जाता है, जिससे पशु इसे पचा नहीं पाते।
- ऑक्सालेट से बचाव: नेपियर में कुछ मात्रा में ऑक्सालेट हो सकता है। इसलिए केवल नेपियर खिलाने के बजाय इसे सूखे भूसे या बरसीम, लोबिया जैसे दलहनी चारे के साथ मिलाकर खिलाना सबसे सुरक्षित और लाभदायक रहता है।
- जल निकासी: खेत में लंबे समय तक पानी जमा न रहने दें, क्योंकि जलजमाव से इसकी जड़ें गलने लगती हैं।