खेती का रकबा बढ़ने से देश में अमरूद का उत्पादन तो तेजी से बढ़ा है, लेकिन प्रति हेक्टेयर मिलने वाली औसत उपज अब भी 14.6 से 14.8 टन पर ही अटकी हुई है।
नई दिल्ली। भारत में पिछले सात वर्षों के दौरान अमरूद के कुल उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह खबर पहली नजर में बहुत अच्छी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छुपा एक दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला है। वास्तव में, अमरूद की यह बंपर पैदावार बागों की उत्पादकता सुधरने से नहीं, बल्कि देश में अमरूद की खेती का रकबा (क्षेत्रफल) बढ़ने की वजह से हुई है।
‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, आज भी देश में अमरूद की औसत उपज 14.6 से 14.8 टन प्रति हेक्टेयर के आसपास ही स्थिर बनी हुई है। इसका मतलब यह है कि हम जमीन तो ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन प्रति हेक्टेयर जो कमाई और फसल किसानों को मिलनी चाहिए, उसमें कोई खास सुधार नहीं हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पारंपरिक तरीकों की जगह अगर किसान वैज्ञानिक बाग प्रबंधन और आधुनिक किस्मों को अपनाएं, तो वे अपनी प्रति हेक्टेयर उपज को दो से तीन गुना तक बढ़ा सकते हैं।

क्या है इस उत्पादन वृद्धि का पूरा गणित?
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2016-17 में देश में करीब 2.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अमरूद की बागवानी होती थी, जो अब बढ़कर लगभग 3.6 लाख हेक्टेयर से भी अधिक हो गई है। क्षेत्रफल में हुई इस लगभग 38.46 प्रतिशत की बढ़ोतरी के चलते ही देश का कुल अमरूद उत्पादन करीब 3.83 मिलियन टन से बढ़कर 5.52 मिलियन टन के पार पहुंच गया है।
क्षेत्रफल का बढ़ना इस बात का सुबूत है कि किसानों के बीच अमरूद की बागवानी को लेकर रुझान तो बढ़ा है, लेकिन पुरानी तकनीकों और देखरेख की कमी के कारण वे हर पेड़ से उतना फल नहीं ले पा रहे हैं, जितना वैज्ञानिक पद्धति से संभव है।
औसत पैदावार स्थिर रहने के मुख्य कारण
कृषि वैज्ञानिकों और बागवानी विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादकता न बढ़ने के पीछे कई बड़ी वजहें हैं:
- पारंपरिक बागवानी का तरीका: ज्यादातर किसान आज भी पुराने ढंग से बाग लगाते हैं, जहां पौधों के बीच 6×6 मीटर की दूरी रखी जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर पेड़ों की संख्या बहुत कम (लगभग 278 पौधे) रह जाती है।
- घटिया किस्म के पौधे: स्थानीय नर्सरियों से बिना सोचे-समझे लिए गए पौधे कई बार बीमारियों से ग्रसित होते हैं और उनकी फल देने की क्षमता कम होती है।
- रोग और कीटों का प्रकोप: अमरूद में ‘उकठा रोग’ (Wilt) और फल मक्खी (Fruit Fly) जैसी समस्याएं पूरी फसल को तबाह कर देती हैं, जिनका समय पर वैज्ञानिक उपचार नहीं हो पाता।
- कटाई के बाद का नुकसान: सही कोल्ड स्टोरेज, पैकिंग और ट्रांसपोर्ट की सुविधा न होने के कारण लगभग 20 से 30 प्रतिशत फल मंडी पहुंचने से पहले ही खराब हो जाते हैं।
कैसे पाएं 37 से 43 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की कुछ उन्नत किस्मों और आधुनिक सघन बागवानी (High-Density Planting) तकनीक से अमरूद की संभावित उपज को 37 से 43 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बड़ी सफलता केवल तभी मिल सकती है जब किसान तीन मुख्य बातों पर विशेष ध्यान दें: उन्नत किस्मों का चयन, वैज्ञानिक बाग प्रबंधन, और कटाई के बाद फलों का सही रखरखाव।
1. उन्नत और रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन
अच्छी पैदावार की शुरुआत सही पौध से होती है। किसानों को हमेशा मान्यता प्राप्त सरकारी नर्सरियों या कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) से ही पौधे खरीदने चाहिए।
- इलाहाबादी सफेदा और लखनऊ-49: यह देश की सबसे लोकप्रिय और ज्यादा फल देने वाली किस्में हैं।
- श्वेता और पंत प्रभात: ये किस्में न केवल भारी पैदावार देती हैं, बल्कि इनके फल भी बेहद आकर्षक और टिकाऊ होते हैं।
- अर्का किरण और ललित: लाल गूदे वाली ये किस्में बाजार में बहुत अच्छे दाम दिलाती हैं और इनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता बेहतर होती है।
2. वैज्ञानिक बाग प्रबंधन
पारंपरिक तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए गए इन अभ्यासों को अपनाएं:
- सघन बागवानी (High-Density Planting): यदि आप 3×2 मीटर या 3×1.5 मीटर की दूरी पर पौधे लगाते हैं, तो एक हेक्टेयर में 1600 से 2200 तक पौधे लगाए जा सकते हैं। इससे न केवल जगह का पूरा इस्तेमाल होता है, बल्कि शुरुआती सालों से ही बंपर कमाई शुरू हो जाती है।
- नियमित कटाई-छंटाई (Pruning): अमरूद में फल हमेशा नई टहनियों पर आते हैं। इसलिए साल में कम से कम एक बार (मई-जून में) पेड़ों की हल्की छंटाई जरूर करें ताकि नई और स्वस्थ शाखाएं निकल सकें।
- बहार प्रबंधन (Crop Regulation): साल में तीन बार फूल आते हैं (अम्बे बहार, मृग बहार और हस्त बहार)। किसानों को केवल मृग बहार (सर्दियों की फसल) लेनी चाहिए, क्योंकि इस समय के फलों की गुणवत्ता सबसे अच्छी होती है और बीमारियां भी कम लगती हैं। इसके लिए गर्मियों के फूलों को गिराने की वैज्ञानिक तकनीक अपनाएं।
3. फल की गुणवत्ता और कटाई के बाद सही रखरखाव
अमरूद एक बहुत ही नाजुक फल है, जो पेड़ से टूटने के बाद तेजी से पकता और खराब होता है।
- सही समय पर तुड़ाई: फल जब हल्के हरे से पीले होने लगें, तभी उन्हें सुबह के समय हाथ से तोड़ें। ध्यान रहे कि फलों पर कोई खरोंच न आए।
- ग्रेडिंग और पैकिंग: तुड़ाई के बाद खराब, छोटे और अच्छे फलों को अलग-अलग (ग्रेडिंग) करें। इन्हें अखबार या फोम नेट में लपेटकर हवादार बक्सों में पैक करें।
- मूल्य संवर्धन (Processing): जब मंडियों में आवक बहुत ज्यादा हो और दाम गिर रहे हों, तब किसान अमरूद से जेली, जाम, पल्प या जूस बनाकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं।
किसानों के लिए अब क्या हैं जरूरी कदम?
अमरूद की बागवानी को एक मुनाफे का सौदा बनाने के लिए किसानों को सामूहिक रूप से काम करने की आवश्यकता है। किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) से जुड़कर किसान सीधे थोक खरीदारों, प्रोसेसिंग कंपनियों और निर्यातकों तक पहुंच सकते हैं, जिससे उन्हें बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और उपज का सही दाम मिलेगा। राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHB) के तहत नए बाग लगाने और ड्रिप इरिगेशन के लिए मिलने वाली सरकारी सब्सिडी का भी पूरा लाभ उठाएं।