जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों ने उठाई आवाज: रसायन मुक्त खेती से आय और सेहत दोनों सुधरने का दावा

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देशभर के ग्रामीण अंचलों में रासायनिक खादों और महंगे कीटनाशकों के बढ़ते चक्रव्यूह से परेशान किसानों ने अब जैविक खेती की दिशा में निर्णायक कदम उठाने की मांग तेज कर दी है। 2 नवंबर 2026 को जारी एक साझा आह्वान में किसानों ने स्पष्ट किया कि लगातार रासायनिक खादों के इस्तेमाल से खेतों की मिट्टी अपनी प्राकृतिक उर्वरा शक्ति खो रही है। इसके साथ ही हर साल कीटनाशकों और उर्वरकों पर होने वाला खर्च खेती की लागत को लगातार बढ़ा रहा है, जिससे औसत किसान कर्ज और अनिश्चितता के भंवर में फंसता जा रहा है।

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों ने उठाई आवाज: मांगें और फायदे

किसानों का कहना है कि अगर देश की मिट्टी को बचाना है और आने वाली पीढ़ियों को गंभीर बीमारियों से दूर रखना है, तो केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर जैविक खेती को जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर समर्थन देना होगा। रसायन मुक्त खेती न केवल उपभोक्ता की सेहत की रक्षा करेगी, बल्कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का भी एक टिकाऊ जरिया बनेगी।

मुख्य बिंदु एक नज़र में

  • घटना / मुद्दा: जैविक खेती के व्यापक विस्तार और सरकारी प्रोत्साहन की देशव्यापी मांग
  • घोषणा तिथि: 2 नवंबर 2026
  • प्रमुख समस्या: रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता का ह्रास, स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ती लागत
  • किसानों की मांगें: सीधी आर्थिक मदद, तकनीकी प्रशिक्षण और अलग मंडियां
  • पर्यावरणीय व आर्थिक लाभ: मिट्टी का पुनर्जीवन, विषाक्तता मुक्त भोजन, लागत में कमी और बेहतर उपज मूल्य

मिट्टी की बिगड़ती सेहत और रासायनिक खेती का बढ़ता बोझ

किसानों के अनुसार, हरित क्रांति के दौर से शुरू हुआ रासायनिक खादों का अनियंत्रित उपयोग अब खेतों की प्राकृतिक जीवन शक्ति को सोख चुका है। पहले जहाँ कम यूरिया या डीएपी में संतोषजनक फसल मिल जाती थी, वहीं अब हर साल ज्यादा खाद डालने पर भी पैदावार स्थिर या घटती दिख रही है। जमीन सख्त होती जा रही है और उसमें पाए जाने वाले केंचुए और मित्र जीवाणु पूरी तरह खत्म होने की कगार पर हैं।

इसके अलावा, लागत का बढ़ता दबाव किसानों की सबसे बड़ी चिंता है। रासायनिक कीटनाशकों और हाइब्रिड बीजों के दाम हर मौसम में बढ़ जाते हैं, जबकि मंडी में उपज का भाव मौसम और बिचौलियों की मर्जी पर निर्भर रहता है। ऐसे में किसान दोनों तरफ से पिस रहे हैं।

किसानों की तीन प्रमुख मांगें

किसानों ने सरकार के समक्ष तीन बुनियादी मांगें रखी हैं ताकि सामान्य किसान भी बिना किसी आर्थिक नुकसान के जैविक खेती अपना सके:

  1. आर्थिक सहायता और सब्सिडी में विस्तार: रासायनिक से जैविक खेती में बदलाव के शुरुआती दो से तीन साल उपज में आंशिक कमी ला सकते हैं। इस संक्रमण काल के दौरान किसानों को प्रति एकड़ प्रत्यक्ष वित्तीय अनुदान या क्षतिपूर्ति सहायता दी जाए ताकि उनका परिवार आर्थिक संकट में न आए।
  2. सुलभ प्रशिक्षण और व्यावहारिक तकनीकी परामर्श: जैविक खाद (जैसे जीवामृत, बीजामृत, वर्मीकम्पोस्ट) और जैविक कीटनाशक (जैसे नीमास्त्र, दशपर्णी अर्क) बनाने के लिए गांव स्तर पर कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के माध्यम से नियमित व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए।
  3. समर्पित जैविक मंडियां और तयशुदा लाभकारी मूल्य: जैविक उत्पाद को सामान्य रासायनिक फसल के भाव पर न बेचना पड़े, इसके लिए हर जिले और प्रमुख मंडी स्तर पर ‘जैविक उपज हाट’ या अलग काउंटर स्थापित किए जाएं, जहाँ किसानों को उनकी मेहनत का प्रीमियम मूल्य मिल सके।

जैविक खेती अपनाने के दीर्घकालिक फायदे

किसानों का तर्क है कि जैविक खेती केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा की गारंटी है:

  • मिट्टी की जीवंतता में सुधार: देशी गाय के गोबर, गोमूत्र और जैविक अवशेषों के प्रयोग से मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है और जल धारण क्षमता बेहतर होती है।
  • सुरक्षित और विष-मुक्त खाद्य: रासायनिक अवशेषों से मुक्त अनाज, फल और सब्जियां आम उपभोक्ताओं को कैंसर और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से सुरक्षित रखने में मदद करती हैं।
  • खेती की लागत में भारी कमी: बाजार से महंगे रासायनिक बैग खरीदने के बजाय जब किसान खेत पर ही खाद और कीटनाशक तैयार करता है, तो इनपुट लागत लगभग 50 से 70 प्रतिशत तक घट जाती है।
  • पर्यावरण और जलस्रोतों का संरक्षण: भूजल और स्थानीय तालाबों में रासायनिक तत्वों का रिसाव बंद होता है, जिससे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित बना रहता है।
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About sapana

Studied MSc Agriculture from Banaras Hindu University and having more than 2 years of field experience in field of Agriculture.

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